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चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

संभवतः अमीर खुसरो (1253 - 1325) के समय से ही दो भाषाओं को मिलाकर खिचड़ी की तरह छंद रचने की एक प्रवृत्ति चली. उन्होंने कई बार एक अपने छंद का एक टुकड़ा फारसी में तो दूसरा ब्रजभाषा में रचा है. जैसे— 'ज़े-हाल- ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनांबनाए बतियां कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जांन लेहू काहे लगाए छतियां ' लेकिन रहीम (अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानां, 1556 - 1627) जब ऐसी खिचड़ी वाली रचना करने पर आए तो उन्होंने खड़ी बोली और संस्कृत का ही मेल कर दिया. उसका एक नमूना बहुत ही लोकप्रिय है— दृष्‍टा तत्र विचित्रिता तरुलता, मैं था गया बाग में। काचितत्र कुरंगशावनयना, गुल तोड़ती थी खड़ी।। उन्‍मद्भ्रूधनुषा कटाक्षविशि;, घायल किया था मुझे। तत्‍सीदामि सदैव मोहजलधौ, हे दिल गुजारो शुकर।। एकस्मिन्दिवसावसानसमये, मैं था गया बाग में । काचितत्र कुरंगबालनयना, गुल तोड़ती थी खड़ी ।। तां दृष्‍ट्वा नवयौवनांशशिमुखीं, मैं मोह में जा पड़ा । नो जीवामि त्‍वया विना श्रृणु प्रिये, तू यार कैसे मिले ।। रहीम तो खैर संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान थ े. उन्होंने कृष्ण की भक्ति में शुद्ध संस्कृत के श्लोक रचने...